सफलता प्राप्त करने के लिए निन्यानवे प्रतिशत योगदान परिश्रम का होता है और केवल एक प्रतिशत योगदान होता है प्रेरणा का

पुस्तक का शीर्षक : पावनी

लेखक : शिव प्रसाद

 लेखक की ओर से सूची : मैंने आपके भेजे हुए प्रश्नों को हिन्दी में अनुवादित किया है और मेरे जवाब और टीकाएँ भी हिन्दी में ही हैं । ऐसा इसलिए किया है क्योंकि मेरे लिए हिन्दी ही सहज और स्वाभाविक भाषा है । और उस पर से यह तो पूरी तरह तर्कसंगत बात है कि जब उपन्यास हिन्दी में है, उसे पढ़ने वाले भी हिन्दी भाषी ही हैं , तो साक्षात्कार भी हिन्दी में ही होना चाहिए ।

 1. कृपया अपनी पुस्तक का संक्षिप्त आख्यान दें

कहानी मध्य-वर्गीय परिवारों की ही है । 1980 और 90 के दशक के दौरान भोपाल शहर में निवासित रविकान्त और मृदुला माथुर और उनका इकलौता बेटा , अनुराग । जहाँ एक ओर पति-पत्नी के बीच बहुत गहरा प्रेम होता है, वहीं दूसरी ओर वे अपने बेटे की परवरिश बहुत प्यार और संवेदनशीलता से करते हैं । किशोरावस्था में आने के बाद अनुराग के व्यवहार में बहुत आक्रोश और तीव्रता आ जाते हैं । इससे घर में तनाव और अस्थिरता स्थान कर जाते हैं । और तभी इनके जीवन में एक विदारक त्रासदी हो जाती है , जिसका पूरा दोष अनुराग पर आ जाता है । एक तरफ बाप के मन का ज्वलन्त रोष , और दूसरी तरफ बेटे के हृदय में जड़ित अपराध-बोध । पिता और पुत्र के बीच एक ऐसी दरार बन जाती है जिसको लाँघ पाना असम्भव–सा हो जाता है ।

ऐसी परिस्थितियों में इनके जीवन में प्रवेश करती है पावनी । सहज और चंचल , प्यार से भरी हुई , मन में असीम उत्साह लिए । एक ऐसी अनोखी भूमिका निभाने के लिए जिसके बारे में वह खुद भी नहीं जानती । लेकिन उनके जीवन से, उनके उलझे हुए रिश्तों से जुड़ जाती है । इन रिश्तों की संकुलता से वह किस तरह से निबाही करती है…., बाकी की कहानी इसी उतार-चढ़ाव को लिए आगे बढ़ती है ।

यह उपन्यास वर्ष 1981 से लेकर 2014 तक के चार दशक और दो पीढ़ियों की जीवन-यात्रा को तय करती है ।

2. आपने इस विषय को क्यों चुना ? लिखने की प्रेरणा आपको कैसे मिली ?

जीवन के अनुभव, सम्बन्धियों, मित्रों और परिचितजनों की ज़िन्दगियों की घटनाएँ, जीवन और समाज की कुछ वास्तविकताएँ और कुछ अपनी कल्पना – इन सब के सामंजस्य से मेरे मन पर जो छवि अंकित हुई, उसी के कारण मैंने यह विषय चुना ।

बचपन से ही हिन्दी भाषा के प्रति मेरी विशेष रुचि रही है । और इसी भाषा में एक पूरा उपन्यास लिखने की इच्छा कई वर्षों से मेरे मन में प्रदीप्त रही । ये रुचि , ये इच्छा ही लिखने की प्रेरणा के स्रोत हैं ।

3. जीवन के प्रति आपका फ़लसफा क्या है ?

जो भी लक्ष्य निर्धारित करते हो, उसकी तरफ बढ़ते हुए परिश्रम , अनुशासन , बुद्धिमानी , विनम्रता और विवेक को अपना आधार बनाओ । लेकिन जीवन को पेंचीदा या दुरूह मत होने दो । इसे सहज और सरल ही रहने दो ।

दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप मत करो, अपनी मान्यताओं या सिद्धान्तों को अपने तक ही सीमित रखो । दूसरों को तकलीफ़ मत दो, हो सके तो सहायता करो ।

इस जीवन में, संसार में, प्रकृति में सौन्दर्य, माधुर्य ,कोमलता और रहस्यमयता की बहुलता है – इन्हें महसूस करो और इस रस-धारा में बहते जाओ ।

4. लेखक बनने की आपकी इस यात्रा में सबसे चुनौतीपूर्ण भाग कौन सा था ?

पूरी कहानी लिखने में कोई रुकावट या चुनौती नहीं आई । परन्तु पाण्डुलिपि को पूरा करने के बाद (इस उपन्यास को मैंने कागज़ पर कलम चला कर लिखा था ) , इसे कम्प्यूटर में टाइप करना काफी कठिन था । देवनागरी कीबोर्ड पर टाइप करना तो बहुत मुश्किल था क्योंकि हमने तो बचपन से देवनागरी में लिखा तो बहुत है, लेकिन टाइप कभी नहीं किया । इसके बाद गूगल इंडिक सॉफ्टवेर को डाउनलोड किया जिसके तहत रोमन हिन्दी में टाइप किया जाता है और शब्द देवनागरी में बन जाते हैं । इसमें भी काफी कठिनाई हुई क्योंकि हिन्दी शब्दों को अंग्रेज़ी अक्षरों के माध्यम से बनाना अपने आप में एक विकट समस्या है । और फिर इसके बाद भी,  पाण्डुलिपि के त्रुटिहीन होने के बावजूद , टाइप की हुई सॉफ्ट कॉपी में अनेक गलतियाँ रह गईं थी ।

चूँकि यह पूरा काम मैंने अकेले किया था, इसलिए इस यात्रा में आई हुई सबसे बड़ी चुनौती यही थी ।

5. आपने उन चुनौतियों से निबटाव कैसे किया ?

कम्प्यूटर में टाइप की हुई सॉफ्ट कॉपी की अनगिनत समीक्षाएँ करनी पड़ी, अनेक संशोधन करने पड़े, तब जाकर पूरी कहानी का सन्तोषजनक परिष्कार हो सका । इस तरह से इस चुनौती का निबटाव हुआ ।

6. प्रकाशक के साथ आपका अनुभव कैसा रहा ?

अगर एक शब्द में कहना पड़े तो मैं कहूँगा कि “ अच्छा “ था ।

कुछ विस्तार में जाएँ , तो इनकी मज़बूतियों और कमज़ोरियों पर छोटी सी चर्चा कर सकते हैं ।

मज़बूतियाँ  इस प्रकार हैं :-

  • मुझ जैसे अज्ञात और नौनिहाल लेखकों को ऐसे प्रकाशकों के समर्थन से अपनी कला को दुनिया के समक्ष लाने का केवल एक अवसर या मंच ही नहीं , बल्कि अमूल्य प्रोत्साहन भी मिलता है ।
  • ये लेखक की मजबूरी का फायदा उठाकर उससे पैसे ऐंठने की फ़िराक में नहीं रहते । बल्कि , लेखक से जो दर ये वसूल करते हैं, वो बिल्कुल वाजिब है, उचित है ।
  • प्रकाशन से पहले जो संविदा पक्की होती है, ये उसका आदर करते हैं और उसके अनुसार इनके हिस्से की जितनी भी ज़िम्मेदारियाँ होती हैं, उनको पूरा करते हैं ।
  • इनके व्यावसायिक प्रक्रम और विधियाँ सम्यक हैं, सरल हैं, और इनमें पारदर्शिता है ।

इनकी कमजोरियाँ इस प्रकार हैं :-

  • पुस्तक में वर्तनी या व्याकरण की एक भी गलती नहीं होनी चाहिए । इसका दायित्व प्रकाशक का भी होता है ( चाहे संविदा में ये उपधारा हो या न हो ) । इसके लिए आवश्यक है कि प्रालेख का पूर्ण और सूक्ष्म अवलोकन प्रकाशक भी करे । इस काम में इनसे चूक हुई है । ( पूरा अवलोकन और संशोधन मुझे ही करना पड़ा । )
  • लेखक जब अपनी रचना को टाइप करके सॉफ्ट कॉपी बनाता है, तब वह उसी सॉफ्टवेर का प्रयोग करता है जो उसके पास उपलब्ध हो, जिसके प्रयोग में उसे सबसे अधिक सुविधा हो । लेकिन हो सकता है कि छापने (printing) के लिए लेखक का प्रयोग किया हुआ सॉफ्टवेर या फॉन्ट ठीक न हो, पूरी तरह से स्पष्ट न हो । इस समस्या का समाधान प्रकाशक को ही निकालना पड़ता है ताकि छपाई उसी फॉन्ट में हो जो सबसे अधिक स्पष्ट हो, प्रचलित हो । अतः , ये आवश्यक है कि प्रकाशक के पास उपयुक्त सॉफ्टवेर / फॉन्ट बदलने का साधन हो ।
  • प्रकाशन-सम्बन्धी कुछ कार्य हैं जो ये निर्धारित समय-सीमा के अन्दर नहीं करते ।
  • इस तरह के काम में लेखक के साथ नियमित रूप से सम्पर्क बनाए रखना बहुत आवश्यक है – फ़ोन / मोबाइल , टिकेट-प्रणाली या इ-मेल के माध्यम से । इस कार्य-विधि में इनसे थोड़ी-सी चूक हुई है ।
  • पुस्तक के आवरण पर चित्रांकन के काम में कई शुरुआती मुश्किलें आईं । इस काम से जुड़े इनके कर्मचारियों को चाहिए कि लेखक के द्वारा दिए हुए निर्देश और परिकल्पना को ठीक से समझें । हाँ, अन्त में इन्होंने उत्कृष्ट काम किया ।

 

7. कुछ लेखकों को लिखते समय एक विचित्र मानसिक अथवा मनोवैज्ञानिक रुकावट या अवरोध का अनुभव होता है क्या आपको भी ऐसे ‘ अवरोध ‘ का सामना करना पड़ा ?

बिल्कुल नहीं । उपन्यास-लेखन के क्षेत्र में यह मेरा पहला प्रयास है और मुझे किसी भी तरह के मानसिक या मनोवैज्ञानिक अवरोध का सामना नहीं करना पड़ा ।

8. यदि सामना करना पड़ा, तो आपने इस अवरोध पर काबू कैसे पाया ?

   ऐसे किसी अवरोध का सामना नहीं हुआ था ।

9. अपनी ऐसी किसी आदत या वृत्ति के बारे में बताएँ , जो आपको ज़्यादा सक्षम या सफल बनाती हो

अनुशासित दिनचर्या । जीवन के अन्य कार्यों और दायित्वों के निभाव की तरह ही लेखन में भी अनुशासन की बहुत आवश्यकता होती है । इस तथ्य के पालन से मुझे सफलता मिलती है ।

10. अपनी ऐसी किसी आदत या वृत्ति के बारे में बताएँ , जिसे आप बदलना चाहते हों

आधुनिकता का एक अभिन्न अंश है , परिवर्तन । और इस परिवर्तन को प्रगतिशील होना चाहिए । लेकिन कलात्मक कृतियों के क्षेत्र में ( लेखन, भाषा , संगीत , आदि में ) बहुधा मुझे ये लगता है कि द्रवण हो रहा है, अवनति हो रही है, तत्त्वों का अपभ्रंश हो रहा है । कुछ लोगों का कहना है कि ये अपभ्रंश नहीं, बल्कि परिवर्तनशीलता है, समय के बहाव का एक अभिन्न अंग है ; इसकी निन्दा मत करो , विरोध मत करो , बल्कि इसे स्वीकार करो । परन्तु जहाँ मैं अपनी यह मान्यता दूसरों पर कभी नहीं थोपता हूँ, वहीं व्यक्तिगत तौर पर मुझे इस तरह का परिवर्तन स्वीकार्य नहीं है । मेरे कुछ स्वजन और मित्र कहते हैं कि मेरी ये मान्यता एक रूढ़िवाद है , आधुनिकता का विरोध है ।

अब मुझे यह तय करना है कि अपनी इस वृत्ति को बदलना चाहिए या नहीं । यदि हाँ , तो किस तरह से , किस सीमा तक …. ।

11. ऐसा कोई सुझाव जो आप नव-लेखकों को देना चाहते हों

मैं इस क्षेत्र में बिल्कुल नौनिहाल हूँ, खुद सीख रहा हूँ । इस लिए दूसरों को सुझाव देने की न तो मुझमें क्षमता है, न ही कोई अधिकार है ।

12. इस उपन्यास को लिखने के दौरान अपनी सबसे मधुर स्मृति के बारे में बताएँ

इस उपन्यास के मुख्य स्थान-आधार हैं ग्वालियर, भोपाल, इन्दौर और माण्डू । कहानी लिखते वक़्त इसमें चर्चित इन शहरों / कस्बों की हर जगह , इमारत , संस्था, मन्दिर ,घर, बग़ीचा, पेड़, पत्थर , सड़क , आदि  पर जाकर मैंने समय बिताया, और उन पलों में इनके मूक अस्तित्व को आभासित किया , और उन्हीं पलों में कहानी के हर पात्र को सजीव रूप से अपने अन्दर महसूस किया, जीवन्त किया, उनके हर सुख-दुःख को अपने दिल-दिमाग पर अंकित किया । वैसे तो कहानी लिखते वक़्त लेखक को हर पात्र का जीवन खुद जीना पड़ता है, लेकिन इन जगहों पे खड़े होकर जिस आत्मिक सिहरन और रसानुभूति में मैं खो गया, वो अद्भुत है, अनुपम है । ये स्मृतियाँ जीवन भर मेरे साथ ही रहेंगी ।

13. आपकी अगली कृति के लिए कथानक या प्रत्यय क्या होगा ?

अभी इसके बारे में कुछ सोचा नहीं है ।

14. छुट्टियाँ मनाने के लिए आपके सबसे मनपसन्द तीन स्थान कौन से हैं ?

गोवा , कूर्ग और स्विट्ज़रलैंड  ।

15. ऐसी कोई उक्ति जो आपको बहुत प्रेरित करती है

यह मूलतः अंग्रेज़ी में है , इस प्रकार, “ Success is ninety-nine percent perspiration and one percent inspiration . “

हिन्दी में अनुवाद कुछ इस प्रकार होगा , “ सफलता प्राप्त करने के लिए निन्यानवे प्रतिशत योगदान परिश्रम का होता है और केवल एक प्रतिशत योगदान होता है प्रेरणा का ।