कतरा चाँद का

इन्सानों की मंडी

 

आज मैंने देखी इंसानों की मंडी,

नर-नारी सजे बिकाऊ जिन्स सरीखे,

और खरीदार घेरे थे हम सरीखे,

जाँचते हुए किसमें कितना है दम,

नकारते उनकी मजबूरियों को,

न ! ये तो बिलकुल बेकार है,

ये तो खुद ही नहीं चल पा रहा,

क्या एक और को ले चलूँ

इसको चलाने को ……..

महँगा है ये सौदा मै नहीं करता,

ज़रा कोई उनसे पूछे,जो उनमें

सामर्थ्य होती तो वो वहां क्यों होते ?

तब तक पीछे से एक सहमी सी

कंपकंपाती आवाज़ कुछ यूं आयी-

“ऐ साहिब हमका लै चलो, हे मलिकार …..”

उसका वाक्य पूरा भी होने न पाया

खरीदार ने उसे ये कह कर भगा दिया-

“ये तो और भी बेकार है देखते नहीं

साथ में इसके बाल-गोपाल हैं

हर थोड़ी देर में वो रोयेंगे और

ये उन्हें चुप कराने भागेगी ………..

कितनी मजदूरी बेकार जायेगी ……….”

अफ़सोस हुआ मानवतारहित मनुष्य देखके

जब अपने बचपन में खुद रोते थे –

क्या माँ ने उन्हें दुलराया न था ?

अपने बच्चे की पुकार पर न बढ़ी उनकी बाँहे?

सच है मुझे न थी दुनियादारी की पहचान

कीमत से तौलते दूसरे की बेबसी ……….

खरीदार बनते ही बदल जाती भावना

भूल जाते मनुष्य और मानवता का ज्ञान !!!